
कुल की लाज बचाने वाली,
बेटों से भी ज्यादा बेटी।
सबको लगती प्यारी प्यारी,
दो कुल की मर्यादा बेटी।।
माँ को लगती सदा दुलारी,
संस्कार घोटकर पीती बेटी।
पापा की आँखों का तारा,
अनुशासन में जीती बेटी।।
मोती वाली आब है बेटी,
जीवन का ख्बाब है बेटी।
हीरे जैसी बेशकीमती,
पाप का जबाब है बेटी।।
पानी वाली धार है बेटी,
रत्नों वाली हार है बेटी।
हँसती हो ससुराल में बेटी,
हर घर का त्योंहार है बेटी।।
वंश बेल का सींचन करती,
फूलों वाला बाग है बेटी।
वो आती तो खुशियाँ आती,
माँ बापू का भाग है बेटी।।
आँखों में हों आँसू उसके,
जीवन ही धिक्कार है बेटी।
स्नेह मिले तो फले वनिता,
मानव पर उपकार है बेटी।।
वो हँसती तो दादी हँसती,
दादू से भी ज्यादा बेटी।
सदा प्यार बरसाने वाली,
कुल की है मर्यादा बेटी।।
किशनलाल खंडेलवाल, भुवनेश्वर
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