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मिट्टी से सिलिकॉन तक दिखी झलक
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77वें गणतंत्र दिवस पर कृषि विरासत और तकनीकी आकांक्षाओं को किया साकार
भुवनेश्वर। 77वें गणतंत्र दिवस पर सोमवार को कर्तव्य पथ पर ओडिशा की झांकी पूरे वैभव के साथ आगे बढ़ी और राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के साथ आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में उसकी बढ़ती भूमिका को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।
माटी से माइक्रोचिप तक। परंपरा में जड़ें, नवाचार से उड़ान विषय पर आधारित इस झांकी ने ओडिशा की कृषि और सभ्यतागत नींव से लेकर तकनीक-आधारित और समावेशी विकास केंद्र के रूप में उभरती पहचान को दर्शाया।
परंपरा और आधुनिक आकांक्षाओं का अनूठा मेल
झांकी में ओडिशा की पारंपरिक ताकतों और आधुनिक आर्थिक लक्ष्यों का सुंदर संयोजन देखने को मिला। कोरापुट कॉफी और कोणार्क सूर्य मंदिर जैसे प्रतीकों के माध्यम से टिकाऊ आजीविका, स्वदेशी कृषि और राज्य की प्राचीन सभ्यतागत विरासत को रेखांकित किया गया। इन दृश्यों ने यह संदेश दिया कि ओडिशा अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहते हुए नवाचार-आधारित विकास की राह पर आगे बढ़ रहा है।
महिला नेतृत्व और समावेशी विकास पर जोर
झांकी के अग्रभाग में महिला नेतृत्व वाली सहभागिता को प्रमुखता से दर्शाया गया। यह ओडिशा की महिला सशक्तीकरण और समावेशी विकास की नीति को रेखांकित करता है, जिसे राज्य सतत प्रगति की मजबूत नींव मानता है। यह हिस्सा इस बात का प्रतीक रहा कि आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ते हुए भी ओडिशा का विकास समान, जनकेंद्रित और समावेशी बना रहे।
तकनीक और नवाचार बने आकर्षण का केंद्र
झांकी के मध्य भाग में एक प्रतीकात्मक हाथ में पकड़ी माइक्रोचिप ने उन्नत तकनीक, डिजिटल बुनियादी ढांचे और कुशल मानव संसाधन के क्षेत्र में ओडिशा की बढ़ती उपस्थिति को दर्शाया।
यह दृश्य इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में राज्य के उभरते महत्व और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के साथ उसके तालमेल को उजागर करता है।
कला, शिल्प और लोक परंपराओं की भव्य प्रस्तुति
ओडिशा की समृद्ध कला और सांस्कृतिक धरोहर भी झांकी का अहम हिस्सा रही। पट्टचित्र चित्रकला, तारकसी (रजत जाली) शिल्प और रंगीन आदिवासी कलाओं के चित्रण ने दर्शकों का ध्यान खींचा। कोरापुट कॉफी को एक बार फिर आदिवासी सशक्तीकरण, टिकाऊ खेती और स्वदेशी उद्यम के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया।
झांकी के किनारों पर भगवान जगन्नाथ के रथ के पहियों से प्रेरित आकृतियां बनाई गईं, जो राज्य की गहरी सांस्कृतिक पहचान को दर्शाती हैं।
इसके साथ ही पारंपरिक वेशभूषा में लोक कलाकारों ने 16वीं शताब्दी के चैती घोड़ा नृत्य की प्रस्तुति देकर ओडिशा की सांस्कृतिक समृद्धि और आत्मनिर्भर भारत में उसके योगदान को जीवंत कर दिया।
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