सुबह-सुबह सज गई
व्याकरण की हमारी बगिया,
कर्ता बोला क्रिया से हँसकर,
“मैं नहीं कर्ता, तू चल कर।
कर्म करे जब दिल से कोई,
विशेषण खुद ही जुड़ जाए वहीं।”
संज्ञा बैठी शालीन बनी,
उसके संग सर्वनाम चला।
“तू, मैं, वह – सब रूप उसी का,
वचन से लिंग का मेल मिला।”
काल ने तब घड़ी उठाई,
“अब, तब, तब से” बातें बताईं।
भूत, वर्तमान, और भविष्य,
हर समय क्रिया ने चाल दिखाई।
क्रिया बोली — “मैं हूँ नारी,
पर हर रूप में ढल जाऊं।
सकर्मक, अकर्मक बनकर,
हर कारक से मिल जाऊं।”
करण ने साधन थामा,
अपादान ने दूरी लाया।
संप्रदान ने भाव जताया,
अधिकार को फिर पास बुलाया।
सम्बंध बोला — “मैं रिश्तों में,
विभक्ति की भाषा बनता हूँ।”
“जैसा, वैसा, जिससे जितना,”
कारण ने कारण को चुपचाप बताया।
विशेषण बोला मुस्काकर,
“मुझे मत ढूंढो अलग कहीं।
विशेष्य के संग जन्म मेरा,
वो बोले जितना, मैं कहूँ उतना।”
उपसर्ग आए जब सजधज कर,
प्रत्यय तब पीछे-पीछे चला।
शब्दों को अर्थों से जोड़कर,
नव शब्दों का निर्माण गढ़ा।
पद ने जब अपने पाँव पसारे,
साहित्य की तब धारा बहाई।
व्याकरण की इस बगिया में,
भाषा ने खूब मुस्कान सजाई।
शब्दों की इस सुन्दर बगिया में,
हेमंत ने ज्ञान का दीप जलाया,
शब्दों और अर्थों का शीतल रस बरसाया,
व्याकरण की इस सुंदर बगिया को
गजब सा सजीव बनाया।।
हेमंत कुमार तिवारी
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