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पीए हत्या मामला आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में बदला

कटक। मालकानगिरि के पूर्व जिलाधिकारी मनीष अग्रवाल को राज्य के उच्च न्यायालय से एक बड़ी राहत मिली है। अदालत ने कल गुरुवार को उनके निजी सहायक (पीए) देव नारायण पंडा की मौत से संबंधित मामले को हत्या से आत्महत्या के लिए उकसाने में बदल दिया। न्यायमूर्ति शशिकांत मिश्र की एकल-न्यायाधीश पीठ ने आदेश दिया कि मामले की जांच आईपीसी (हत्या) की धारा 302/506/201/204 के बजाय धारा 306/120-बी/34 आईपीसी (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत की जाए।
खबरों के अनुसार, मिश्र ने 30 पेज के आदेश में कहा है कि यहां दिए गए तथ्यों और कानून के विश्लेषण के आधार पर इस न्यायालय का मानना है कि आईपीसी की धारा 302/506/201/204 के तहत दंडनीय अपराध प्रथम दृष्टया नहीं बनते हैं। हालांकि, आईपीसी की धारा 306/120-बी/34 के तहत अपराध के लिए आरोपी व्यक्तियों के खिलाफ आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त सामग्रियां हैं। पीठ ने आगे कहा कि परिणामस्वरूप, सीआरएलएमसी को आंशिक रूप से अनुमति दी गई है। आक्षेपित आदेश को केवल आईपीसी की धारा 302/506/201/204 के तहत अपराधों को धारा 306/120-बी/34 आईपीसी के तहत अपराधों द्वारा प्रतिस्थापित करने की सीमा तक संशोधित किया गया है। निचली अदालत को निर्देश दिया जाता है कि वह तदनुसार आगे बढ़ें और मामले को यथासंभव शीघ्रता से अधिमानतः आठ महीने के भीतर निपटाने का प्रयास करे।
सूत्रों के अनुसार, देव नारायण पंडा तत्कालीन मालकानगिरि जिलाधिकारी मनीष अग्रवाल के पीए के रूप में कार्यरत थे और 27 मई को ड्यूटी के दौरान रहस्यमय तरीके से लापता हो गए थे। अगले दिन उनका शव सतीगुड़ा बांध स्थल से बरामद किया गया था।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण डूबना और उसकी जटिलताएं बताई गईं। इसमें यह भी पता चला कि शरीर पर कोई चोट या हिंसा का निशान नहीं था।
बाद में करीब एक साल बाद 30 नवंबर 2020 को मृतक की पत्नी ने आरोप लगाया कि उसके पति जिलाधिकारी के आवास पर गये थे और करीब आधे घंटे तक वहां रहकर वापस लौट आये। सुबह 10 बजे वह फिर जिलाधिकारी के आवास पर गए और वापस नहीं लौटे।
उन्हें गड़बड़ी का संदेह हुआ और उन्होंने इस संबंध में लिखित शिकायत दर्ज कराई। मालकानगिरि एसडीजेएम के निर्देश के अनुसार, अग्रवाल और तीन अन्य के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया गया था। मामले की क्राइम ब्रांच जांच भी की गई।
हालांकि, मालकानगिरि एसडीजेएम अदालत के आदेश को चुनौती देते हुए अग्रवाल ने उच्च न्यायालय का रुख किया था।
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