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बसंती पाढ़ी को मिला जमीन का हक
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कब्जाधारियों को तीन महीने में खाली करने का आदेश
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2013 में सड़क चौड़ीकरण के दौरान हुआ था अवैध कब्जा
ब्रह्मपुर। छतरपुर के अतिरिक्त जिला न्यायाधीश प्रदीप कुमार सामल ने एक महत्वपूर्ण भूमि स्वामित्व विवाद मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने निचली अदालत का फैसला रद्द करते हुए बसंती पाढ़ी और अन्य आवेदकों को भूमि का वास्तविक स्वामी माना और कब्जाधारियों को तुरंत भूमि खाली करने का निर्देश दिया।
मामले के अनुसार, वर्ष 2015 में बसंती पाढ़ी और अन्य ने नरेंद्रपुर और अम्बापुआ मौजा की कुछ होमस्टेड जमीन पर दावा करते हुए सिविल मुकदमा दायर किया था। उनका आरोप था कि वर्ष 2013 में सड़क चौड़ीकरण के दौरान कुछ स्थानीय व्यवसायियों ने उनकी निजी जमीन पर लकड़ी की केबिनें लगाकर अवैध कब्जा कर लिया था। दूसरी ओर, प्रतिपक्ष ने दावा किया कि जमीन सिंचन विभाग की है और वे वर्षों से वहां व्यापार कर रहे हैं।
अपील में सामने आया बड़ा तथ्य
निचली अदालत ने पहले मुकदमा खारिज कर दिया था। इसके बाद आवेदकों ने अपील दायर की थी। दस्तावेज़ों की दोबारा जांच में यह सामने आया कि कि वर्ष 1953 में आवेदकों के पूर्वजों द्वारा यह भूमि खरीदी गई थी। वर्ष 1976 के सेटलमेंट में मालिकों की अनुपस्थिति के कारण जमीन गलती से सिंचन विभाग के नाम दर्ज हो गई थी। बाद में राजस्व विभाग ने इस गलती को सुधार दिया था। अदालत ने इन्हीं आधारों पर बसंती पाढ़ी और अन्य को कानूनी स्वामी माना।
तीन महीने में कब्जा ढांचों को हटाने का आदेश
अदालत ने कहा कि प्रतिपक्ष ने यह मानकर कब्जा किया कि जमीन सरकारी है, परंतु कानूनी रूप से वे अवैध कब्जाधारी हैं। अदालत ने अनिवार्य निषेधाज्ञा जारी करते हुए आदेश दिया कि कब्जाधारी तीन महीने के भीतर लकड़ी की केबिनें और सभी अस्थायी ढांचे खुद हटाएं। अन्यथा आवेदक अदालत के माध्यम से आदेश को लागू करा सकेंगे।
मुआवजे का दावा खारिज
हालांकि अदालत ने स्वामित्व अधिकार और जमीन खाली कराने का आदेश दिया, लेकिन मुआवजे की मांग को खारिज कर दिया।
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