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पहला मृत डोनर लीवर ट्रांसप्लांट रहा सफल, मरीज होगा डिस्चार्ज
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वर्ल्ड लीवर डे पर उम्मीद की नई किरण
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महिला डॉक्टर बनीं अंगदान की मिसाल
भुवनेश्वर। ओडिशा में स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करते हुए एम्स भुवनेश्वर ने इस अप्रैल में अपना पहला मृत डोनर लीवर ट्रांसप्लांट सफलतापूर्वक किया है। खास बात यह है कि जिस मरीज को यह लीवर प्रत्यारोपित किया गया था, उसकी स्थिति अब बहुत अच्छी है और उसे कल सुबह डिस्चार्ज किया जाएगा। यह उपलब्धि वर्ल्ड लीवर डे के अवसर पर उम्मीद और जीवनदान का सशक्त संदेश है।
इस प्रेरणादायक कहानी के केंद्र में भद्रक जिले की होम्योपैथिक चिकित्सक डॉ. राधा पाढ़ी हैं, जिन्होंने मृत्यु के बाद भी एक व्यक्ति को नई जिंदगी देकर मानवता की मिसाल कायम की। वर्षों तक प्लेटलेट डिसऑर्डर से जूझने के बावजूद उन्होंने अंगदान का संकल्प लिया था। 2 अप्रैल 2026 को उनके निधन के बाद ब्रेन स्टेम डेथ घोषित की गई और उनके परिवार ने उनकी अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए अंगदान के लिए सहमति दी।
3 अप्रैल को एम्स भुवनेश्वर की सर्जिकल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी टीम ने उनके लीवर को 46 वर्षीय पुरुष मरीज में सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित किया। अब मरीज तेजी से स्वस्थ हो चुका है और पूरी तरह स्थिर है, जिसे कल सुबह अस्पताल से छुट्टी दी जाएगी।
यह जटिल ट्रांसप्लांट प्रक्रिया डॉ ब्रह्मदत्त पटनायक के नेतृत्व में और नई दिल्ली स्थित आईएलबीएस के प्रो विनीयेन्द्र पामेचा के मार्गदर्शन में संपन्न हुई। इसमें एनेस्थीसिया, गैस्ट्रोएंटरोलॉजी और क्रिटिकल केयर की टीमों ने मिलकर समन्वित प्रयास किया।
एम्स भुवनेश्वर के कार्यकारी निदेशक डॉ आशुतोष बिस्वास ने डोनर के परिवार के प्रति गहरा आभार व्यक्त करते हुए कहा कि अंगदान के प्रति जागरूकता बढ़ाना समय की जरूरत है। मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ प्रभास रंजन त्रिपाठी के नेतृत्व में डॉ पाढ़ी को ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ देकर सम्मानित किया गया।
सेवा की मिसाल बनीं डॉ राधा
भद्रक जिले के चांदबाली ब्लॉक स्थित सहदेवदास पाटना गांव की निवासी 39 वर्षीय डॉ राधा पाढ़ी जीवनभर मरीजों की सेवा में समर्पित रहीं। बचपन से ही प्लेटलेट डिसऑर्डर से पीड़ित होने के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी। नाक से खून आना और बार-बार बीमार पड़ना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था, फिर भी उन्होंने अपने पेशे और सेवा भावना को जारी रखा।
उन्हें 28 मार्च को गंभीर हालत में एम्स भुवनेश्वर में भर्ती कराया गया था, जहां डॉक्टरों के प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। उनके निधन के बाद परिवार ने लीवर दान का फैसला लिया, जिससे एक मरीज को नया जीवन मिला।
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