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प्रमुख संचालिका शांता अक्का ने सेविकाओं से ‘स्व-बोध’ अपनाने का किया आह्वान

  •     राष्ट्रीय सेविका समिति की उत्कल प्रांत बैठक कटक में सम्पन्न

कटक। राष्ट्रीय सेविका समिति, उत्कल प्रांत की दो दिवसीय प्रांत बैठक कटक के गति राउतपाटना स्थित सरस्वती विद्या मंदिर में सम्पन्न हुई। इस अवसर पर समिति की प्रमुख संचालिका शांता अक्का और क्षेत्र प्रचारिका सुश्री लतिका पाढ़ी की गरिमामयी उपस्थिति रही। बैठक में प्रांत और जिला अधिकारी बड़ी संख्या में शामिल हुए तथा संगठनात्मक गतिविधियों एवं आगामी योजनाओं पर विमर्श किया गया।

अपने संबोधन में प्रमुख संचालिका शांता अक्का ने सेविकाओं से ‘स्व-बोध’ (आत्मबोध) अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि “स्व” का अर्थ केवल व्यक्तिगत अस्तित्व तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यापक रूप से हिंदू महिला की पहचान है जो भारत माता की पुत्री और समाज की दिशा निर्धारित करने वाली है। उन्होंने कहा कि आज की युवा महिलाएं अपने वास्तविक स्वरूप और भूमिका को समझें तथा भारत को विश्वगुरु बनाने में सक्रिय योगदान दें।

जीवन में आवश्यक परिवर्तन लाने का आग्रह

शांता अक्का ने सेविकाओं से आत्ममंथन करने और अपने जीवन में आवश्यक परिवर्तन लाने का आग्रह किया ताकि वे समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकें। प्रकृति का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा, कि वृक्ष केवल देते हैं, लेते नहीं। उसी प्रकार महिलाओं को भी प्रेम, सद्भाव और शांति का वातावरण फैलाना चाहिए।

उन्होंने सेविकाओं को परंपरागत आचरणों जैसे भूमि वंदन, मंदिर दर्शन और प्रेरणादायी साहित्य के अध्ययन से शक्ति अर्जित करने का संदेश दिया। ये साधन, उन्होंने कहा, सेविकाओं को “तेजस्वी हिंदू राष्ट्र के पुनर्निर्माण” की दिशा में सक्रिय योगदान देने में समर्थ बनाएंगे। उन्होंने पंक्ति उद्धृत की “जाग रहा है जन गण मन, निश्चित होगा परिवर्तन” और सेविकाओं से समाज में सकारात्मक परिवर्तन की वाहक बनने का आह्वान किया।

प्लास्टिक-मुक्त प्रबंध की भी सराहना की

अपने भाषण में शांता अक्का ने कार्यक्रम में किए गए प्लास्टिक-मुक्त प्रबंध की भी सराहना की और इसे जागरूक एवं सतत जीवन का प्रतीक बताया।

कटक के गौरवशाली समुद्री इतिहास का उल्लेख करते हुए उन्होंने हिंदू सभ्यता की प्राचीन जहाज निर्माण कला और अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक संबंधों की याद दिलाई। उन्होंने मौर्य और विजयनगर साम्राज्य का उल्लेख करते हुए भारत की सांस्कृतिक और आर्थिक सम्पन्नता पर प्रकाश डाला। विजयनगर काल की एक घटना साझा करते हुए उन्होंने बताया कि उस समय व्यापारी खुले रास्तों पर सोने के सिक्कों के साथ लेन-देन करते थे, जो उस युग की समृद्धि और सामाजिक विश्वास का अद्वितीय उदाहरण है।

निःस्वार्थ सेवा का जीवन अपनाने का संदेश

अपने उद्बोधन के अंत में उन्होंने ललिता सहस्रनाम से एक श्लोक – “इच्छाशक्ति, दानशक्ति, क्रियाशक्ति स्वरूपिणी, सर्वधारा सूत्रनिष्ठा सर्वार्थदात्री” – का पाठ किया और महिलाओं से माता पार्वती की भांति शक्ति, भक्ति और निःस्वार्थ सेवा का जीवन अपनाने का संदेश दिया।

प्रांत बैठक का समापन सेविकाओं के इस संकल्प के साथ हुआ कि वे आत्मबोध, सामाजिक सद्भाव और राष्ट्र सेवा के आदर्शों को अपने जीवन में आत्मसात करेंगी।

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