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महिलाओं के लिए भुवनेश्वर देश की सबसे सुरक्षित शहर

  •     राष्ट्रीय वार्षिक रिपोर्ट और इंडेक्स 2025 में शीर्ष स्थान

  •     भुवनेश्वर की बढ़ रही है प्रतिष्ठा

  •     महिलाओं के लिए समावेशी माहौल देने वाला शहर भी बना

भुवनेश्वर। ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर को महिलाओं के लिए भारत का सबसे सुरक्षित शहर घोषित किया गया है। राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) की अध्यक्ष विजया किशोर रहाटकर ने गुरुवार को राष्ट्रीय वार्षिक रिपोर्ट और इंडेक्स 2025 जारी करते हुए यह जानकारी दी। रिपोर्ट ने भुवनेश्वर की बढ़ती प्रतिष्ठा को न केवल सुरक्षित, बल्कि महिलाओं के लिए समावेशी माहौल देने वाला शहर बताया है।

रिपोर्ट के अनुसार, कोहिमा, विशाखापट्टनम, आइजोल, गंगटोक, ईटानगर और मुंबई भी महिलाओं के लिए सबसे सुरक्षित शहरों में शामिल हैं। वहीं रांची, श्रीनगर, कोलकाता, दिल्ली, फरीदाबाद, पटना और जयपुर को सबसे असुरक्षित शहरों की श्रेणी में रखा गया है। रिपोर्ट में कहा गया कि सुरक्षित शहरों की सूची में शामिल स्थानों पर बेहतर पुलिसिंग, उच्च लैंगिक समानता, आधुनिक बुनियादी ढांचा और नागरिक भागीदारी जैसे कारक देखने को मिले।

महिलाओं की धारणा और चुनौतियां

सर्वेक्षण में शामिल छह में से दस महिलाओं ने अपने शहर को ‘सुरक्षित’ बताया, लेकिन 40 प्रतिशत महिलाओं ने खुद को ‘ज्यादा सुरक्षित नहीं’ या ‘असुरक्षित’ माना। रात में सुरक्षा की धारणा में भारी गिरावट देखने को मिली, खासकर सार्वजनिक परिवहन और मनोरंजन स्थलों पर। शैक्षणिक संस्थानों को दिन में 86 प्रतिशत महिलाओं ने सुरक्षित माना, लेकिन रात में और कैंपस से बाहर यह आंकड़ा काफी कम हो गया।

कारण और बुनियादी ढांचे की कमी

रिपोर्ट में असुरक्षा की धारणा के पीछे अपर्याप्त सुरक्षा ढांचा, खराब स्ट्रीट लाइटिंग और सार्वजनिक परिवहन की खामियों को मुख्य कारण बताया गया है। 31 शहरों की 12,770 महिलाओं से मिले जवाबों पर आधारित इस इंडेक्स ने राष्ट्रीय सुरक्षा स्कोर 65 प्रतिशत तय किया है।

कार्यस्थलों और नीतियों की स्थिति

करीब 91 प्रतिशत महिलाओं ने कार्यस्थलों को सुरक्षित माना, लेकिन आधी महिलाएं यह नहीं जानती थीं कि उनके कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न रोकथाम (पीओएसएच) नीति लागू है या नहीं। जिन स्थानों पर यह नीति मौजूद थी, वहां महिलाओं ने इसे प्रभावी बताया। फिर भी केवल एक चौथाई महिलाओं ने माना कि अधिकारी शिकायतों पर प्रभावी कार्रवाई करते हैं।

उत्पीड़न और रिपोर्टिंग की स्थिति

साल 2024 में 7 प्रतिशत महिलाओं ने सार्वजनिक स्थलों पर उत्पीड़न का अनुभव किया, जबकि 24 साल से कम उम्र की महिलाओं में यह आंकड़ा 14 प्रतिशत तक पहुंच गया। मोहल्लों (38 प्रतिशत) और सार्वजनिक परिवहन (29 प्रतिशत) को उत्पीड़न के सबसे बड़े केंद्र बताया गया। चिंताजनक बात यह रही कि केवल तीन में से एक महिला पीड़िता ही घटना की रिपोर्ट करने के लिए सामने आई। रिपोर्ट ने जोर दिया कि केवल आधिकारिक अपराध आंकड़े महिलाओं की वास्तविक स्थिति नहीं दिखा सकते।

साइबर अपराध और व्यक्तिगत डेटा के दुरुपयोग पर चिंता – रहाटकर

रिपोर्ट जारी करते हुए एनसीडब्ल्यू अध्यक्ष विजया रहाटकर ने कहा कि महिलाओं की सुरक्षा केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं है, बल्कि यह उनके जीवन के हर पहलू से जुड़ा है, चाहे वह शिक्षा हो, स्वास्थ्य, काम के अवसर हों या आवाजाही की स्वतंत्रता। उन्होंने कहा कि जब महिलाएं असुरक्षित महसूस करती हैं, तो वे खुद को सीमित कर लेती हैं और इसका असर पूरे देश के विकास पर पड़ता है।

उन्होंने महिलाओं की सुरक्षा को शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और डिजिटल चार आयामों से देखने की आवश्यकता बताई। साइबर अपराध और व्यक्तिगत डेटा के दुरुपयोग पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि महिलाओं को सड़कों पर होने वाले अपराधों के साथ-साथ ऑनलाइन अपराध, आर्थिक भेदभाव और मानसिक उत्पीड़न से भी बचाना होगा।

सकारात्मक पहल और सामाजिक जिम्मेदारी

रहाटकर ने महिला पुलिसकर्मियों की संख्या में वृद्धि और सार्वजनिक परिवहन में महिला चालकों की मौजूदगी को आत्मविश्वास बढ़ाने वाला कदम बताया। उन्होंने महिला हेल्पलाइन, स्मार्ट सिटी में सीसीटीवी कवरेज और रेलवे स्टेशन व बस अड्डों पर सुरक्षा नेटवर्क जैसी पहलों की भी सराहना की।

उन्होंने समाज से भी जिम्मेदारी साझा करने की अपील करते हुए कहा कि हम अक्सर केवल सिस्टम को दोष देते हैं, लेकिन यह भी देखना होगा कि हमने खुद क्या किया। चाहे हेल्पलाइन का उपयोग हो, जागरूकता अभियान में सहयोग हो या सार्वजनिक शौचालयों को साफ रखना, समाज की भूमिका भी उतनी ही अहम है।

समान अवसर और गरिमा का सवाल

रहाटकर ने कहा कि महिलाओं की सुरक्षा केवल उत्पीड़न और हिंसा से बचाव भर नहीं है, बल्कि इसमें समान अवसर, समान वेतन और कार्यस्थल पर गरिमापूर्ण माहौल सुनिश्चित करना भी शामिल है।

यह नारी इंडेक्स पीवैल्यू एनालिटिक्सनॉर्थकैप यूनिवर्सिटी और जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल की पहल है और इसे ग्रुप ऑफ इंटेलेक्चुअल्स एंड अकैडमिकियंस द्वारा प्रकाशित किया गया है।

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