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गर्मी के कारण धधकने लगे जंगल

  • मयूरभंज में जंगल में भीषण आग से कीमती वन संपदा खाक

  • सात दिनों में 1,172 फायर प्वाइंट्स का पता चला

भुवनेश्वर। गर्मी के कारण ओडिशा में जंगल धधकने लगे हैं। मयूरभंज जिले में स्थित उदला वन क्षेत्र में भयंकर जंगल की आग ने कहर बरपा रखा है। बारिपदा वन प्रभाग के अंतर्गत आने वाले टनकसाही रिजर्व फॉरेस्ट में तेजी से फैल रही इस आग को नियंत्रित करने में वन विभाग के अधिकारी मुष्किलों का सामना कर रहे हैं।
टनकसाही रिजर्व फॉरेस्ट अपनी समृद्ध जैव विविधता के लिए जाना जाता है। यहां कीमती साल के पेड़ और दुर्लभ औषधीय पौधे प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। आग के कारण इन प्राकृतिक संपदाओं को भारी नुकसान हो रहा है। स्थानीय वन अधिकारियों के लिए दूरस्थ इलाकों में फैली आग तक पहुंचना कठिन हो गया है, जिससे पर्यावरण को गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है।
गर्मियों के बढ़ते प्रभाव के साथ राज्यभर में जंगल की आग की घटनाएं बढ़ रही हैं, जिससे पर्यावरणविदों और प्रकृति प्रेमियों की चिंता बढ़ गई है।
वन सर्वेक्षण ऑफ इंडिया के आंकड़ों के अनुसार, पिछले सात दिनों में ओडिशा के जंगलों में 1,172 जगहों पर आग लगने की घटनाएं दर्ज की गई हैं।
इन जिलों में जंगल की आग
मालकानगिरि, नवरंगपुर, कोरापुट, नुआपड़ा, कलाहांडी, बरगढ़, बलांगीर, रायगड़ा, कंधमाल, सुंदरगढ़, बौध, सुवर्णपुर, झारसुगुड़ा, संबलपुर, गजपति, गंजाम, देवगढ़, अनुगूल, कटक, केंदुझर, मयूरभंज, ढेंकानाल, और जाजपुर।
जलवायु कारण और वनाग्नि की संवेदनशीलता
बताया गया है कि बढ़ते तापमान और शुष्क मौसम ने जंगलों को आग के लिए संवेदनशील बना दिया है। आंकड़ों के अनुसार, 2025 में अब तक सामने आए 1,956 जंगल की आग की घटनाओं में से 46% सिर्फ फरवरी के एक सप्ताह में हुईं। कोरापुट वन वृत्त (सर्कल) में 11 बड़े सक्रिय जंगल की आग दर्ज की गई, जिससे दक्षिणी ओडिशा के जंगलों में गिरते हुए पत्तों के कारण आग का खतरा और बढ़ गया।
ओडिशा के जंगलों की संवेदनशीलता
राज्य के कुल वन क्षेत्र में से 27.97% जंगलों को अत्यधिक अग्नि-संवेदनशील माना जाता है। 57,066 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले ये जंगल, खासकर पर्णपाती वन क्षेत्र, आग के लिए सबसे अधिक संवेदनशील हैं। वनाग्नि की घटनाओं के पीछे मानवीय कारण सबसे अधिक जिम्मेदार हैं।
विशेष रूप से केंदुझर और अन्य आदिवासी क्षेत्रों में जंगल की आग का मुख्य कारण मनुष्यजनित गतिविधियां हैं। 2025 में अब तक दर्ज हुई 1,100 से अधिक आग की घटनाएं संरक्षित वनों के बाहर शुरू हुईं।
नियंत्रण और बचाव प्रयासों की जरूरत
जंगल की आग से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाने की आवश्यकता है। वन विभाग और प्रशासन को आधुनिक तकनीकों, सतत निगरानी और स्थानीय लोगों की भागीदारी से इस समस्या का समाधान निकालना होगा।

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