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उपभोक्ता संरक्षण कानून के मकड़जाल में उलझ रही डॉक्टरी, जोखिम लेना किया कम

  • उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के कारण मुकदमों की बढ़ती संख्या से चिकित्सा सेवा हो रही प्रभावित

  • डॉक्टरों को मिले सुरक्षा व्यवस्था, अस्पतालों में तोड़फोड़ के खिलाफ कड़े कानून की व्यवस्था लागू करे केंद्र सरकार

  • तोड़फोड़ और बवाल के कारण डॉक्टरों ने किया जोखिम लेना कम

  • मरीजों को मिले पीआईआई का सीधा लाभ

भुवनेश्वर- उपभोक्ता संरक्षण कानून के मकड़जाल में डॉक्टरी व्यवस्था उलझती जा रही है। इससे डॉक्टर और मरीजों के बीच मुकदमेबाजी की संख्या बढ़ती जा रही है। इससे चिकित्सकीय व्यवस्था पर असर पड़ रहा है। उल्लेखनीय है कि 1986 में कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट बना था। इस दौरान या स्पष्ट नहीं था कि चिकित्सा व्यवस्था भी और खासकर डॉक्टर इसके दायरे में आएंगे। एक विवाद उत्पन्न होने के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। वर्ष 1993 में वीपी सांथा बनाम इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के बीच मामले की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि चिकित्सक और चिकित्सकीय व्यवस्था भी इस अधिनियम के तहत आएंगे। इस समय तक मरीज जहां डॉक्टर को भगवान मानते थे और डॉक्टर मरीज को भगवान मान कर सेवा करते थे, वह विचारधारा इस फैसले से प्रभावित होने लगी है। मरीज उपभोक्ता हो गए और डॉक्टर उत्पाददाता। इसके बाद वर्ष 2003 में एक संशोधन विधेयक लाया गया और कंज्यूमर प्रोटक्शन एक्ट में संशोधन कर इसकी व्यवस्थापिका की सुनवाई के अधिकार को बढ़ाते हुए जुर्माना राशि लिमिट तय कर दी गई। इसके तहत जिला उपभोक्ता फोरम में 5 लाख तक के मामले की सुनवाई, राज्य उपभोक्ता आयोग में 20 लाख तक के मामले की सुनवाई और इससे ऊपर के मामले केंद्रीय उपभोक्ता आयोग में होनी तय की गई। अब जिला उपभोक्ता फोरम में पांच लाख तक की जुर्माना राशि की सुनवाई होने के कारण मुकदमों की संख्या बढ़ती गई। इसके बाद 2003 में यह राशि बढ़ा कर क्रमशः 20 लाख, एक करोड़ और इससे अधिक कर दी गयी। इससे मामलों की संख्या में और बढ़ोतरी आई। यह जानकारी फेडरेशन इंटरनेशनल लॉ, मेडिसिन, एथिक्स एंड इनोवेशन के संस्थापक अध्यक्ष तथा वर्ल्ड एसोसिएशन आफ लेप्रोस्कोपी सर्जरी के अध्यक्ष प्रोफेसर डॉ राजेश सी शाह ने दी। उन्होंने बताया कि अक्सर मुकदमे को लेकर कोई भी व्यक्ति जिले के बाहर नहीं जाना चाहता है। इस कारण जहां लोगों को जिले के अंदर मुकदमे लड़ने के लिए व्यवस्था मिली, वहीं इसका एक दूसरा पहलू भी उभरा कि मुकदमेबाजी की संख्या बढ़ गई। इसके बाद चिकित्सक और रोगी के बीच मामले बढ़ने लगे। यह ऐसे मामले होते हैं, जिसमें रोगी यह दावा करता है कि चिकित्सक की लापरवाही के कारण उसे कैजुअल्टी हुई है। मामला उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत जुर्माने की राशि के अनुसार जिला उपभोक्ता फोरम, राज्य उपभोक्ता आयोग या केंद्रीय उपभोक्ता आयोग के समक्ष दाखिल किया जाता है। इस दौरान सबसे अधिक नुकसान यदि किसी को होता है, तो वह मरीज को होता है, जो सही मायने में पीड़ित होने के बावजूद वह यह साबित नहीं कर पाता कि उसे इलाज में लापरवाही की वजह से कैजुअल्टी हुई है और ना ही उसके वकील यह साबित कर पाते हैं। इसमें कुछ परसेंट ऐसा होता है, जिसमें फैसला मरीज के पक्ष में जाता है, क्योंकि वह साबित नहीं कर पाते। इस दौरान समय की होने वाली बर्बादी और मुकदमाबाजी के खर्चे का भार डॉक्टर पर पड़ता है, जिससे चिकित्सक अपनी फीस को बढ़ा देते हैं। इस कारण चिकित्सा व्यवस्था महंगी होती जा रही है। इसलिए चिकित्सा व्यवस्था को उपभोक्ता संरक्षण एक्ट से बाहर किया जाना चाहिए। इतना ही नहीं, अस्पतालों में तोड़फोड़ करने पर सजा के प्रावधान को केंद्र सरकार द्वारा लागू किया जाना चाहिए। इससे तोड़फोड़ करने वालों पर कार्यवाही सुनिश्चित हो पाएगी। साथ ही चिकित्सकों के लिए सुरक्षा व्यवस्था भी केंद्र सरकार को मुहैया कराना चाहिए, जिससे वह बेफिक्र होकर अपनी सेवा मरीजों को दे पाएं। अक्सर अस्पतालों में हो रहे हमले के कारण चिकित्सा करने की प्रणाली प्रभावित हो रही है। इमरजेंसी जैसे मामले में 95% ऐसा होता है कि मरीज के बचने की संभावना कम है और 5 फ़ीसदी ऐसा होता है कि यदि सही समय पर चिकित्सक जोखिम उठाते हैं तो मरीज को बचाया जा सकता है, लेकिन हमले के कारण चिकित्सकों ने ऐसे जोखिमों को उठाना लगभग नहीं के बराबर कर दिया है, जिससे एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल भागते समय मरीज दम तोड़ देता है। इसलिए सरकार को चिकित्सकों के लिए सुरक्षा व्यवस्था और तोड़फोड़ करने वालों के खिलाफ कठोर कानून लाने की जरूरत है। साथ ही मरीज के परिवारजनों को भी जागरूक होने की जरूरत है कि चिकित्सक रोगियों की सेवा के लिए ही बने होते हैं। इस दौरान चिकित्सक को भी जोखिम लेना पड़ता है, ताकि मरीज को बचाया जा सके, लेकिन चिकित्सा व्यवस्था के प्रति जागरूकता नहीं होने के कारण लोग समझते हैं कि डॉक्टर की लापरवाही से मरीज की मौत हो गई, जबकि मौत और जन्म का रहस्य आज तक सुलझ नहीं पाया है। डॉक्टर पद्धति के अनुसार मरीज का इलाज करते हैं।

मरीज को मिले बीमा का लाभ – सरकार को व्यवस्था करनी चाहिए कि प्रोफेशनल इंडिमनिटी इंश्योरेंस का लाभ रोगियों को मिले, जैसा कि मोटर इंश्योरेंस आदि के तहत किया जाता है। चिकित्सक इलाज के दौरान होने वाले संभावित जोखिम को देखते हुए बीमा तो करवाते हैं, लेकिन इसका लाभ मरीजों को नहीं मिल पाता है, क्योंकि वह यह साबित नहीं कर पाते कि इलाज के दौरान लापरवाही के कारण उनको कैजुअल्टी हुई है। यहां एक बात गौरतलब रहे कि विवादों से दूर रहते हुए यह देखेें कि मरीज शारीरिक रूप से कैजुअल है या नहीं। जैसा कि मोटर वाहन एक्ट के तहत बीमा राशि पीड़ित के चोट के अनुसार प्रदान की जाती है, ठीक ऐसी ही व्यवस्था मरीजों के लिए भी लागू करने की जरूरत है।

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