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अमरजीत हादसा – सच को मिला साथ, विश्वास से राजकुमार का इस्तीफा

  • अव्यवस्थाओं पर बैठक नहीं बुलाने पर संस्थापक सदस्य राजकुमार हुए नाराज
  • एके भगत ने भी मांगें पूरी नहीं होने पर विश्वास का आधिकारिक ह्वाट्सएप ग्रुप छोड़ा
  • उठ रहा है सवाल-आत्ममंथन से क्यों भाग रही है आयोजन समिति?
अमरजीत साह

भुवनेश्वर- अमरजीत की मौत के बाद अव्यवस्थाओं पर मंथन नहीं होने के कारण हिन्दीभाषी समाज के सबसे बड़े संगठन विश्वास से एक सदस्य ने प्राथमिक सदस्यता से ही त्यागपत्र दे दिया है। इनके नाम हैं-राजकुमार। इतना ही नहीं, एक अन्य सदस्य एके भगत ने भी मांगें पूरी नहीं होने पर विश्वास का आधिकारिक ह्वाट्सएप ग्रुप छोड़ दिया है। सूत्रों ने यह जानकारी दी है। इन सभी लोगों ने कुआखाई नदी में डूबने से हुई अमरजीत की मौत के बाद व्यवस्थाओं-अव्यवस्थाओं पर मंथन के लिए हिन्दीभाषी संगठन हिन्दी विकास मंच और विश्वास की बैठक बुलाने की मांग की थी, ताकि कमियों को रेखांकित कर भविष्य में सतर्कता बरती जा सके, लेकिन अब तक किसी भी पदाधाकिरी ने ऐसा नहीं किया, जिससे नाराज होकर इन लोगों ने यह निर्णय लिया। इधर, इस हादसे के सुर्खियों में छाने के बाद कुछ सदस्यों ने मंथन की जगह मीडिया की कार्यशैली पर अंगुली उठानी शुरू कर दी, लेकिन मीडिया के सच उजागर करने को साथ मिलना शुरू हो गया है।

मीडिया की कार्यशैली पर अंगुली उठाने वालों को यह पता होना चाहिए कि अक्सर किसी आयोजन के दौरान हादसा होने पर एक नैतिक जवाबदेही तय करने के लिए संगठन की बैठक बुलाई जाती है, ताकि मंथन किया जाये। नैतिक जवाबदेही तय होने का मतलब यह नहीं होता है कि सजा मिले, इसका मतलब होता है कि कम से कम आत्मग्लानी हो और आगे सतर्क रहने की विंदुओं पर गौर किया जाए।

अमरजीत की मौत को शुरू में दबाने का प्रयास भी हुआ। मौत की सूचना सार्वजनिक करने पर कुछ सदस्यों की टांग खिंचाई भी हुई थी।

एके भगत ने की थी यह मांग

 

एके भगत का लिखा संदेश

 

राजकुमार ने लिखा है

I never thought a day would come when we would have to face such a sad mishap on the day of our awaited ocassion.

A 12 y / o boy lost his life in the same Kua Khai river where we celebrated Chath Puja today.
My condolences are with the family and I hope the boy’s soul rests in peace.
May his family find strength to fight this situation.

When Biswas was started, 20 years back, we as the first members made this committee brick by brick, starting from cleaning the ghat with our own hands to making it safe for everybody who would come there, we had worked hard to make this dream a reality.

Today, with the utmost carelessness, ignorance and dirty politics, for the first time in so many years, Biswas saw a black day, a day that will never be forgotten.
As a founder member of Biswas, I am deeply disturbed and I would like to raise a question to the present office bearer and Committee members, why after 20 years of experience, they still couldn’t take the safety measures that needed to be taken? A little boy lost his life, and it is only by luck that the other 3 who were also drowning were rescued, and not by safety guard or committee but by the boy who died, his brother himself.
My question is, why did the situation come to such in the first place, was it deliberately ignored or were the people so busy in getting their pictures clicked to get into highlight in newspaper and media that they forgot the duties that needed to be carried out?

1. There were hardly any light arrangement, apart from the ones pointing at the stage.
2. There was no proper barricading, depth of water was not measured, barricades were not put to maintain safety.
3. There were no boats like every year, who would constantly have their eyes on the river.

4. There was not enough police, not enough security guard, not enough volunteers.

5. And most of all, there was no true sense of regret I could see in most of the eyes. My heart aches to know, that our life goes on so easily, but we constantly forget, that a life has been lost and has affected a whole family.

Finally, I believe that the present body should take some moral responsibility and step down by their own and dissolve the present body of Biswas.

I propose a meeting immediately to talk deeply on the matter of further steps that will need to be taken not just to avoid the situation to happen again but also to make Biswas a committee that our people believe in again.

 

बिस्वास परिवार के प्रिय सदस्यों,

कल मैंने इस समूह में एक संदेश लिखा था इस आशा के साथ कि इससे कुछ फर्क पड़ेगा और इस परिस्थिति में कुछ भावनाओं और संवेदनाओं को व्यक्त करने के लिए एक मौका मिलेगा। लेकिन 24 घंटे बित जाने के बाद भी, मेरे मैसेज पर अध्यक्ष और सचिव की कोई उचित प्रतिक्रिया नहीं आई।

न तो सहानुभूति के दो लिखे गए और न ही बच्चे के जीवन के नुकसान पर किसी भी तरह का उचित ध्यान नहीं दिया गया ।

बल्कि, लोगों की ओर से आई कुछ प्रतिक्रिया इस तथ्य की अनदेखी करने के लिए एक औचित्य की तरह लग रही थी कि यह बिस्वास के नाम पर हुआ है।
कुछ लोग बिना किसी विवेक के एक-दूसरे से ‘सहमत’ होने में भी लगे हुए थे।

इस सब से अधिक, मुझे लगता है कि वे लोग जो नेपथ्य में बहुत बात करते हैं, वे कभी पर्दे से बाहर नहीं आते हैं। और इस तरह की स्थितियों में सार्वजनिक रूप से जो बोलते हैं, उन लोगों में किसी और की तुलना में गलती ज्यादा होती है।
मैं समझता हूँ कि कुछ व्यक्तिगत कारण हो सकते हैं या वे इसे प्रभाव में या कुछ व्यक्तिगत समीकरणों के तहत ऐसा कर सकते हैं, लेकिन आखिरकार, अगर कोई इस तरह के एक मजबूत मामले पर अपनी राय देने के लिए खड़ा नहीं हो सकता है, तो मुझे विश्वास है कि ऐसे जगह पर रहने का कोई औचित्य नहीं है जो संस्था अपने पीछे के भावनाओं और संवेदनाओं को इतनी आसानी से भूला दे।
अब जीवन के इस चरण में, हम जैसे लोग अपना समय लगातार उन लोगों में समझ बनाने की कोशिश में नहीं बिता सकते हैं, जो अपने स्वयं के गलत कामों को स्वीकार करने या अन्य लोगों की भावनाओं या संवेदनाओं की परवाह नहीं करते हैं।
अब यहाँ होने से ऐसा लगने लगा है कि यह व्यर्थ का प्रयास है, और मुझे इसके बाद भी यह पता नहीं है कि क्या इससे कोई फर्क पड़ेगा भी कि नहीं , लेकिन अगर दिलों में सम्मान का कोई अर्थ बचा है, तो मुझे उम्मीद है कि इससे फ़र्क़ पड़ेगा ।
बिस्वास हमारे लिए एक सपने की उड़ान थी , और हमने वह सब कुछ किया जो हम इसे एकजुट रखने के लिए कर सकते थे।
एसोसिएशन को छोड़ना मेरे लिए एक बहुत कठिन निर्णय है। लेकिन मुझे आशा है कि आप इसे समझेंगे कि अब यह आवश्यक हो गया था।
उम्मीद है कि हमारा व्यक्तिगत बंधन वैसा ही अटूट रहेगा जैसा कि पिछले 20 वर्षों से है।
धन्यवाद आप सभी का ।
शुभ विदा

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