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पाइक विद्रोह स्मारक को मिलेगी तीर्थस्थल की मान्यता – राष्ट्रपति

  • राष्ट्रपति ने किया पाइक विद्रोह स्मारक का  शिलान्यास

शिलान्यास समारोह में शामिल राष्ट्रपति, राज्यपाल, मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री। फोटो- राष्ट्रपति के फेसबुक से।

भुवनेश्वर । खुर्दा के बरुणेई में बनने वाले पाइक विद्रोह स्मारक परिसर हमारे इतिहास के गौरवशाली अध्यायों से देशवासियों को परिचित कराने के साथ-साथ  युवा पीढ़ी को पूर्वजों के बलिदान का महत्व समझाने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करेगा। इस स्मारक  को आने वाले समय में एक तीर्थ-स्थल की महिमा प्राप्त होगी। खुर्दा के बरुणेई में पाइक विद्रोह स्मारक के शिलान्यास व भूमिपूजन के अवसर पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने यह बात कही। इस अवसर पर आयोजित भव्य कार्यक्रम में ओडिशा के राज्यपाल प्रो गणेशीलाल, आंध्र प्रदेश के राज्यपाल विश्वभूषण हरिचंदन, मुख्यमंत्री नवीन पटनायक, केन्द्रीय पेट्रोलियम व इस्पात मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान, केन्द्रीय संस्कृति व पर्य़टन मंत्री प्रह्लाद सिंह पटेल, केन्द्रीय मंत्री प्रताप षडंगी व राज्य सरकार के पर्यटन व संस्कृति मंत्री ज्योति प्रकाश पाणिग्राही भी उपस्थित थे।

राष्ट्रपति ने अपने अभिभाषण में  कहा कि वह खुर्दा की इस पवित्र धरती से, मैं पाइक विद्रोह के वीर-बलिदानियों को नमन करता हूँ। उन्होंने कहा कि  भगवान जगन्नाथ का यह क्षेत्र भक्ति और क्रान्ति का अपूर्व संगम प्रस्तुत करता है। यहाँ के पाइक विद्रोहियों ने अन्याय के विरुद्ध जब शस्त्र उठाया तो उनका युद्धघोष था ‘जय जगन्नाथ’।उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र के खेतिहर योद्धाओं को पाइक कहा जाता था। वे ऐसे किसान थे जिनमें युद्ध करने का कौशल और साहस होता था। उन्हें राजा द्वारा करमुक्त जमीन दी जाती थी जिस पर खेती करके वे अपनी आजीविका चलाते थे। 19वीं सदी के आरंभ में अंग्रेजों ने इस क्षेत्र पर भी कब्जा कर लिया और उनकी मालगुजारी व्यवस्था का बोझ यहाँ के किसानों पर भी पड़ने लगा। स्वाभिमानी पाइकों ने विद्रोह कर दिया। खुर्दा विद्रोह के महानायक जयी राजगुरु को बेरहमी से फांसी दी गयी। उन्होंने कहा कि जयी राजगुरु के वीरगति प्राप्त करने के बाद, अंग्रेजों ने सोचा होगा कि पाइकों के विद्रोह को उन्होंने कुचल दिया। परंतु विद्रोह की आग सुलगती रही जिसे बक्शी जगबंधु बिद्याधर ने अपने साहसी नेतृत्व से पाइकअ विद्रोह की ज्वाला का रूप दिया। 1817 में कंध जनजाति के लोगों ने बक्शी जगबंधु की सेना के साथ मिलकर अंग्रेजों पर भीषण हमला किया।  उन्होंने कहा कि अंग्रेजों के अत्याचार के विरुद्ध लड़ने वाली सेनाओं में ओडिशा के इस क्षेत्र के सभी वर्गों के लोग जुड़ गए और पाइकअ विद्रोहियों का समर्थन किया। जय जगन्नाथ का घोष करते हुए भूस्वामी, किसान, आदिवासी, शिल्पकार, जुलाहे, कारीगर और मजदूर, सभी ने पाइकअ विद्रोहियों का साथ दिया और इस तरह वह विद्रोह एक व्यापक आंदोलन बन गया। राष्ट्रपति ने कहा कि यद्यपि अंग्रेज उस आंदोलन को दबाने में सफल रहे और बक्शी जगबंधु कारावास में शहीद हुए लेकिन वह विद्रोह एक सुसंगठित आंदोलन के रूप में अमर हो गया। उन्होंने कहा कि  सन 2017 में उस आंदोलन के 200 साल पूरा होने के उपलक्ष में भारत सरकार ने बड़े पैमाने पर अनेक समारोह किए। पाइक विद्रोह के विषय पर अध्ययन और अनुसंधान करने के लिए उत्कल विश्वविद्यालय में एक विशेष पीठ की स्थापना की गई है। उन्होंने कहा कि इस स्मारक के बन जाने पर यहाँ देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों और विशेषकर युवाओं को पाइक विद्रोह से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध होगी। पाइकअ विद्रोह स्मारक का निर्माण करने में, केंद्र और राज्य सरकार के प्रयास सराहनीय हैं। राष्ट्रपति ने कहा कि उत्कल की  इस पवित्र भूमि में वह शक्ति है जिसने चंडाशोक को धर्माशोक बना दिया था। ओडिशा के लोग प्राचीन काल से ही अनेक देशों में अपनी सभ्यता, दर्शन कला और संस्कृति की सौगात लेकर जाते रहे हैं। कला के उत्कर्ष के इस उत्कल क्षेत्र ने पूरे विश्व में भारत का गौरव बढ़ाया है। उन्होंने कहा कि ओडिशा की सभ्यता और संस्कृति ने सदियों पहले कोणार्क के सूर्य मंदिर का निर्माण संभव किया। इस समृद्ध परंपरा के विषय में लोगों को जागरूक बनाने से उन्हें प्रेरणा मिलेगी और वे आत्म-गौरव की भावना के साथ ओडिशा और भारत के भविष्य के निर्माण के लिए उत्साहित होकर कार्य करेंगे। उन्होंने कहा कि  प्रकृति ने ओडिशा को अपना असीम वरदान दिया है। शस्य श्यामला उपजाऊ धरती, हिलोरें भरता विशाल समुद्र, खनिज पदार्थों से समृद्ध रत्न-गर्भा भूमि, प्रचुर वन संपदा से भरपूर क्षेत्र, आकर्षक पर्वतमाला और इन सबसे बढ़कर प्रतिभाशाली और मेहनती लोगों का यह राज्य विज्ञान से लेकर पर्यटन तक सभी क्षेत्रों में अग्रणी स्थान प्राप्त करने की क्षमता रखता है। राष्ट्रपति ने कहा कि पर्यावरण का संरक्षण करते हुए प्राकृतिक संपदाओं का समुचित उपयोग करने के अवसर ओडिशा में हैं। परम्पराओं का सम्मान करते हुए जन-जातियों को आधुनिक विकास से जोड़ने और समावेशी विकास को बल देने का कार्य ओडिशा के समग्र विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। राष्ट्रपति ने अपने अभिभाषण में उत्कल-गौरव मधुसूदन दास, उत्कल-मणि गोपबंधु दास से लेकर आधुनिक ओडिशा के निर्माता बीजू बाबू को याद करते हुए कहा कि  ओडिशा के लोगों के विकास के लिए अमूल्य प्रयास किए थे।  उन्होंने कहा कि  हम सबको यह सदैव ध्यान रखना है कि भारत के गौरव और देश की स्वाधीनता के लिए अनगिनत लोगों ने कुर्बानी दी है। उन्होंने कहा कि उन्हें  विश्वास है कि आधुनिक विश्व समुदाय में भारत को अग्रणी स्थान दिलाने के लिए हर संभव प्रयास करके, उन बलिदानी वीरों के प्रति सही मायनों में हम सब अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे।

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