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कारगिल युद्ध – जब पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी

(कारगिल दिवस पर विशेष)

इतिहास सैनिकों की शौर्य गाथाओं से भरा पड़ा है, परंतु कारगिल विजय का नाम भारतीय सैनिकों की बहादुरी और हार ना मानने के हौसले के लिए याद किया जाता है. असीम दुर्गम परिस्थितियों में अदम्य साहस के साथ जो अद्भुत वीरता भारतीय सैनिकों ने दिखाई है, पूर्व के इतिहास में इसके बराबर की कोई भी मिसाल पेश नहीं कर सका.

संयुक्ता कुमारी केसरी, मंत्री, रचनात्मक समिति (राष्ट्रीय किसान मोर्चा), मंत्री, नई दिल्ली जिला भाजपा

कारगिल को शत्रुओं से मुक्त कराने के लिए हमारे देश के सुर वीरों ने जो अदम्य साहस दिखाया, वह हर देशवासी को गर्व से भर देता है. कारगिल युद्ध ना सिर्फ भारतीय सैनिकों के शौर्य एवं पराक्रम और देश के प्रति उनके जज्बे को दर्शाता है, बल्कि यह युद्ध ठंडी बर्फीली वादियों में पाकिस्तान की नापाक साजिश को भी उजागर करता है. पाकिस्तान ने उस वक्त भारत के पीठ में छुरा भोंकने का कार्य किया, जब 1999 में लाहौर घोषणा पत्र पर शांति के प्रयासों के लिए हस्ताक्षर किए जा रहे थे. अपनी क्षमता को बिना पहचाने हुए पाकिस्तान ने यह साजिश रची, परंतु युद्ध की हार में शर्मिंदगी से बचने के लिए उसने दुनिया के कई देशों से मध्यस्था की भी गुहार लगाई. पाकिस्तान को जून आते-आते लगने लगा था कि उसे एक बार फिर अपमानजनक हार का मुंह देखना होगा इसके बाद उसने ईरान से मध्यस्था की अपील की, लेकिन ईरान ने यह अपील ठुकरा दी. वहीं 4 जुलाई को नवाज शरीफ ने तत्काल में अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के सामने इस संघर्ष को रोकने की गुहार लगाई. अमेरिका ने स्वीकार किया कि पाकिस्तान के नियंत्रण रेखा का उल्लंघन किया है. साथ ही अमेरिका जल्द से जल्द युद्ध बंद करवाना चाहता था. इससे पूर्व पाकिस्तान ने अपने अजीज दोस्त चीन के दरवाजे पर पहुंचा, जहां से भी उसे बेहद ठंडी प्रतिक्रिया मिली. इतिहास सैनिकों की शौर्य गाथाओं से भरा पड़ा है, परंतु कारगिल विजय का नाम भारतीय सैनिकों की बहादुरी और हार ना मानने के हौसले के लिए याद किया जाता है. असीम दुर्गम परिस्थितियों में अदम्य साहस के साथ जो अद्भुत वीरता भारतीय सैनिकों ने दिखाई है, पूर्व के इतिहास में इसके बराबर की कोई भी मिसाल पेश नहीं कर सका. भारत और पाकिस्तान की सरहदों पर स्थित कारगिल दुनिया के सबसे ऊंची और खराब मौसम परिस्थितियों वाला युद्ध मैदान है. 1999 में हुआ युद्ध भारत और पाकिस्तान के टाइगर नामक पहाड़ी पर हुआ था, जो कि श्रीनगर से 250 किलोमीटर की दूरी पर है और इस पहाड़ी पर मौसम बहुत ही ठंडा होता है, जो कि रात में -45 डिग्री तक पहुंच जाता है और रातें भी बहुत लंबी होती हैं. चोटी पर तैनात भारतीय सैनिकों की चुनौती ने उनके मंसूबों पर पानी फेर दिया. यह युद्ध ६० दिनों तक चला और 26 जुलाई 1999 को कारगिल जंग में विजय की घोषणा हुई. यह युद्ध हर भारतीयों को गर्व से भर देने वाला है और इसकी हर गाथा हमें राष्ट्रभक्ति के भाव से सराबोर कर देती है. शुरू में पाकिस्तान के नापाक इरादों को घुसपैठ माना गया और बहुत जल्द ही उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया गया, लेकिन घुसपैठियों की रणनीति को जानने के बाद भारतीय सेना को यह महसूस होने लगा कि बड़े पैमाने पर हमले की योजना बनाई जा रही है और फिर क्या था, भारत सरकार ने ऑपरेशन विजय के लिए दो लाख सैनिकों को तत्काल मोर्चे पर भेजा.

दरअसल, भारत और पाकिस्तान के मध्य में 1971 के बाद भी कई सैन्य संघर्ष होते रहे. 1980 के दशक में होने वाली सैन्य झगड़े 1990 के दौरान कश्मीर में अलगाववादी गतिविधियों के कारण बढ़ते हुए तनाव और संघर्ष में जिनमें से अधिकांश पाकिस्तान द्वारा समर्थित किया गया था और साथ ही 1998 में दोनों देशों के दोनों देशों द्वारा परमाणु परीक्षण के कारण तनाव और बढ़ गया था. पाकिस्तान का यह भी मानना था कि इस क्षेत्र में कोई भी तनाव कश्मीर मुद्दे को अंतर्राष्ट्रीय ध्यान आकर्षित करेगा, जिससे समाधान निकलेगा. स्थिति को शांत करने के लिए दोनों देशों ने फरवरी 1999 में लाहौर घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किए. इसमें कश्मीर मुद्दे को द्विपक्षीय वार्ता के जरिए सुलझाने का वादा किया गया, लेकिन पाकिस्तान ने अपने सैनिकों और अर्द्धसैनिक बलों को छुपाकर नियंत्रण रेखा के पार भेजना शुरू कर दिया. इसका उद्देश्य कश्मीर और लद्दाख के बीच की कड़ी को तोड़कर भारतीय सेना को सियाचिन ग्लेशियर से हटाना था. पाकिस्तान ने इस बात का दावा किया कि यदुकुल लड़ने वाले सभी लोग कश्मीरी आतंकी हैं, लेकिन युद्ध में बरामद दस्तावेजों और पाकिस्तानी नेताओं के बयानों से यह बात स्पष्ट हो चुकी थी कि पाकिस्तान की सेना परोक्ष रूप से इस युद्ध में शामिल थी. इसी बीच भारतीय खुफिया एजेंसियों ने पाकिस्तान के लेफ्टिनेंट जनरल मोहम्मद अजीज और जनरल परवेज मुशर्रफ के बीच एक टेलीफोन वार्ता को टेप कर लिया. फोन के दौरान दोनों ने पाकिस्तानी सेना की टुकड़ियों की तैनाती के बारे में बातचीत की स्टेट का भारत ने व्यापक प्रचार किया और पाकिस्तानी साजिश दुनिया के सामने बेनकाब हो गई. जून आते-आते नापाक इरादे वाले पाकिस्तान को यह महसूस होने लगा कि अब अपमानजनक हार का मुंह देखना पड़ेगा. इसके बाद उसने मध्यस्था के लिए ईरान से गुहार लगाई, लेकिन ईरान ने इस अपील को ठुकरा दी. वहीं 4 जुलाई को नवाज शरीफ में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के सामने इस संघर्ष को रोकने के लिए गुहार लगाई. अमेरिका ने स्वीकार किया कि पाकिस्तान ने नियंत्रण रेखा का उल्लंघन किया है. साथ ही अमेरिका जल्द से जल्द युद्ध बंद करवाना चाहता था. इससे पूर्व पाकिस्तान ने अपने दिल अजीज दोस्त चीन के दरवाजे पर अभी पहुंचा, परंतु वहां से भी उसे बेहद ठंडी प्रतिक्रिया मिली. भारतीय फौज की तवांग और अमेरिका के दबाव के कारण पाकिस्तान को अपनी फौज को पीछे हटाना पड़ा है. इसके साथ ही भारतीय सेना ने उन इलाकों पर फिर से कब्जा कर लिया, जिस तरह पाकिस्तान कब्जा करने की कोशिश कर रहा था. 26 जुलाई 1999 को यह युद्ध खत्म हुआ और भारत ने विजयश्री को प्राप्त किया. इस युद्ध में कैप्टन विक्रम बत्रा के साथ भारतीय सेना मेजर जनरल ईऑन करडोजो ने 26 जुलाई 1999 को चौकी पर बहादुरी से लड़ाई लड़ी, जिसमें पाकिस्तान का दबदबा था. नियंत्रण रेखा के नियमों का सम्मान नहीं करने पर पाकिस्तान की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर घोर आलोचना और विश्व के सभी देशों ने नियंत्रण रेखा का सम्मान करने और सफलतापूर्वक युद्ध लड़ने के लिए भारत की भूरी भूरी प्रशंसा की. द इंडियन एक्सप्रेस में लिखे एक आर्टिकल में रक्षा विशेषज्ञ उदय भास्कर कहते हैं “(भारतीय सेना को) लेकिन काफी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी. लगभग 550 सैनिक शहीद हुए थे और 1400 के करीब घायल हो गए थे. जवानों की कैजुअल्टी दर्शा रही थी कि हमारे पास उस दौरान रक्षा के सभी उचित संसाधन मौजूद नहीं थे, सैन्य उपकरणों के अभाव में भी मध्य और निचले रैंक के जवानों ने गजब की नेतृत्व क्षमता दिखाई थी.” इसलिए हर साल 26 जुलाई कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है तथा इस दिन देश के प्रधानमंत्री अमर जवान ज्योति पर सभी शहीद सैनिकों को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं.

 

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