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राष्ट्रीय अर्थ संगोष्ठी में आर्थिक विपन्नता तथा अनावश्यक विषमता के निर्वाण के अमोघ उपायों चर्चा

  • जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती महाराज ने कीअध्यक्षता

अशोक पाण्डेय, पुरी

पुरी गोवर्द्धन मठ में श्रीजगन्नाथपुरी गोवर्द्धन पीठ के 145वें पीठाधीश्वर जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती महाराज की अध्यक्षता में पहली बार आध्यात्मिक धरातल पर पहली राष्ट्रीय अर्थ संगोष्ठी आयोजित की गई.

इसमें आनलाइन आध्यात्मिक विचारों से जुड़े विद्वानों में डा सुब्रमण्यम स्वामी, सांसद राज्यसभा,  एडीएन वाजपेयी भूतपूर्व कुलपति एपीएस विश्वविद्यालय रेवा मध्यप्रदेश, प्रो गिरिश चन्द्र त्रिपाठी, पूर्व कुलपति,बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय एवं सम्प्रति चेयरमैन उत्तरप्रदेश उच्च शिक्षा परिषद और प्रो रेखा आचार्य स्कूल आफ इकोनोमिक्स डीएवीवी इन्दौर आदि ने हिस्सा लिया. संगोष्ठी में लगातार तीन घण्टे तक अर्थ की आध्यात्मिक परिभाषा, अर्थोपार्जन के उद्देश्य, कृषि-गोरक्ष्य, वाणिज्यादि अर्थोपार्जन के विविध स्त्रोतों, आर्थिक विपन्नता तथा अनावश्यक विषमता के निर्वाण के अमोघ उपायों तथा अर्थ के संचय, संरक्षण, उपभोग तथा वितरण की स्वस्थ विधि आदि पर नामचीन वक्ताओं ने अपने-अपने विचार प्रस्तुत किये.

संगोष्ठी में सभी विद्वानों के विचारों को सुनने के उपरांत जगतगुरु स्वामी निश्चलानन्दजी सरस्वती महाराज ने अपने अध्यक्षीय भाषण में यह दिव्य संकेत किया कि वेदांतशास्त्र के अनुसार सच्चिदानंद स्वरुप सर्वेश्वर जगत का निर्माता तथा आकाश, वायु, तेज, जल, पृथ्वी स्वरुप से अभिव्यक्त सिद्ध है. परम अर्थ परमात्मा की प्रकृति के योग से सर्व रुपों में स्फूर्ति के कारण पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश और प्रकृति की अर्थ संज्ञा है. मृत्यु, जड़ता और अर्थ विहीन परम अर्थ परमात्मा की प्राप्ति में जिसका साक्षात अथवा परम्परा से उपयोग हो;  उसका नाम अर्थ है. भोग्य-सामग्री का नाम अर्थ है. उसके सेवन से प्राप्त पुष्टि और तुष्टि का नाम काम है.

अर्थ के उपार्जन तथा सेवन की वह विधा जिसके फलस्वरुप देह, इन्द्रीयगण, प्राण, अन्तःकरण तथा जीव में मृत्यु, जड़ता और दुःख से अतिक्रांत होने के अनुकूल बल और वेग का आधान हो उसका नाम धर्म है. मृत्यु, जड़ता तथा दुःख से विमुक्त सच्चिदानंद होकर शेष रहना मोक्ष है. अर्थ का अर्थ जीव के जीवन का प्रयोजन और उसकी सिद्धि में हेतुभूत सामग्री है. सच कहा जाय तो वैश्विक महामारी कोरोना के संक्रमण काल में एहतियात के साथ अपने-अपने घरों में रहकर और फेसबुक पर आनलाइन होकर जगतगुरु के अर्थ पर आधारित आध्यात्मिक विचारों का श्रवण तथा देश के विभिन्न विद्वानों के विचारों को सुनना हरप्रकार से प्रेरणादायक सिद्ध हुआ.

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